देश में सुपर अल नीनो को लेकर सुपर टेंशन है। देश के 180 से ज्यादा वैज्ञानिक इसको लेकर टेंशन में हैं। वैज्ञानिकों के अलावा पारिस्थितिकी विशेषज्ञों ने साथी शोधकर्ताओं और क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों से आगामी सुपर अल नीनो घटना के लिए तैयार रहने की अपील पर हस्ताक्षर किए हैं। इस घटना का देश की प्राकृतिक प्रणालियों पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है। अल नीनो की पहचान उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से होती है।बढ़ता तापमान बढ़ाएगा परेशानीप्रशांत महासागर में तापमान लगातार 0.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से ऊपर बढ़ा है और अगस्त में यह 2.6 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुंच गया। अनुमानों में चार डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा के अंतर की आशंका जताई गई है, जो पिछले 1,000 वर्षों में सबसे ज्यादा है। हस्ताक्षर करने वालों ने अपनी अपील में कहा कि हम साथी पारिस्थितिकी विशेषज्ञों से आह्वान करते हैं कि वे अपने शोध और निगरानी प्रयासों को मजबूत और विस्तारित करें। ताकि चरम जलवायु घटनाओं के प्राकृतिक दुनिया और उससे जुड़े सामाजिक तंत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।क्या हो सकता है इससेइस महीने की शुरुआत में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने कहा था कि वर्तमान अल नीनो की स्थिति आने वाले महीनों में और मजबूत होकर बड़ी घटना का रूप ले सकती है। इसके फरवरी 2027 तक जारी रहने की संभावना है। हस्ताक्षरकर्ताओं के अनुसार, इतनी तीव्रता वाली अल नीनो घटना का भारत, उसकी आबादी और पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।ऐसा हो सकता है असरइसके संभावित प्रभावों में बड़े पैमाने पर प्रवालों का सफेद पड़ना और उनका खत्म होना। जंगल में आग की घटनाओं में वृद्धि तथा बड़े वर्षावन वृक्षों का नष्ट होना शामिल हैं। सूखे और भीषण गर्मी की स्थिति बनने की भी बहुत ज्यादा संभावना है, जो भारत के किसानों, मछुआरों और चरवाहों के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है।