नई दिल्ली : तृणमूल कांग्रेस यानी All India Trinamool Congress के नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिह्न को लेकर विवाद की गेंदअब सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। चुनाव आयोग ने 17 सितंबर 2026 के अंतरिम आदेश में बंटी हुई पार्टी के दोनों गुटों को मूल पार्टी नाम और आरक्षित सिंबल इस्तेमाल करने से रोक दिया और आगामी उपचुनावों के लिए अलग नाम-सिंबल दिए थे। आयोग ने साफ किया है कि पार्टी पर अंतिम फैसला Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के पैरा 15 के तहत होना बाकी है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि चुनाव आयोग की शक्तियाों के मद्देनजर और सुप्रीम कोर्ट की कानूनी लड़ाई क्या मोड़ ले सकती है ?चुनाव आयोग का फैसला फिलहाल क्या हैदरअसल, 17 सितंबर के अंतरिम आदेश में चुनाव आयोग ने कहा है कि AITC में दो प्रतिद्वंद्वी गुट हैं और दोनों खुद को पार्टी बताते हैं। इस कारण आयोग ने मूल नाम All India Trinamool Congress और घास और जोड़ा फूल सिंबल को फिलहाल दोनों गुटों के इस्तेमाल से रोक दिया। इसके बाद ममता बनर्जी गुट को Mamata All India Trinamool Congress नाम और फुटबॉल खिला़ड़ी का चिह्न दिया गया। और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले दूसरे गुट को भी अलग नाम Democratic Trinamool Congress और लिफाफा सिंबल मिला। हालांकि यह यह अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि मौजूदा उपचुनावों को देखते हुए बनाई गई अंतरिम व्यवस्था है।ममता गुट की सुप्रीम कोर्ट में गुहार और किन मुद्दों पर जोरममता गुट की याचिका चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश को चुनौती देती है और मूल TMC नाम तथा मूल चुनाव चिह्न के इस्तेमाल की अनुमति बहाल करने की मांग से जुड़ी है। याचिका में आयोग द्वारा पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और विभिन्न सदस्यों की स्थिति को लेकर किए गए आकलन पर भी सवाल उठाए गए हैं। कुछ बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित होने की स्थिति में उनके दावों को पार्टी नियंत्रण के आकलन में किस तरह देखा जाना चाहिए, अदालत से दिशा निर्देश मांगा गया है।EC के अंतिम फैसले में किन बातों की जांच महत्वपूर्ण होगी?हालांकि चुनाव आयोग ने फिलहाल अभी अंतरिम आदेश ही दिया है। बाद में पैरा 15 के तहत आयोग को उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर यह निर्धारित करना होगा कि मान्यता प्राप्त AITC के रूप में किस गुट को माना जाए। इसके लिए पार्टी संविधान, संगठनात्मक पदाधिकारियों की वैधता, पार्टी के विभिन्न संगठनात्मक स्तरों पर समर्थन और अन्य प्रासंगिक रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकते हैं। शीर्ष अदालत ने सादिक अली केस में सुप्रीम कोर्टने माना था कि आयोग का फैसला संबंधित प्रतिद्वंद्वी गुटों पर बाध्यकारी होता है।मुसलमान UCC का विरोध क्यों करते हैं? मुस्लिम Personal Law और समान नागरिक संहिता की कानूनी बहस समझिएसुप्रीम कोर्ट के पास फिलहाल क्या विकल्प हैं? यदि सुप्रीम कोर्ट ममता की याचिका पर सुनवाई करता है तो चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश की न्यायिक समीक्षा कर सकता है और यह देख सकता है कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र और लागू कानूनी प्रक्रिया के अनुसार काम किया या नहीं। अदालत अंतरिम स्तर पर आयोग के आदेश पर रोक लगाने, उसमें बदलाव करने या फिलहाल उसे लागू रहने देने जैसे आदेशों पर विचार कर सकती है। जैसे कि हाल के NCP विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया के दौरान एक अंतरिम व्यवस्था बनाई थी, जिसमें एक गुट को अलग नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने दिया गया तथा मूल सिंबल के इस्तेमाल को अंतिम न्यायिक परिणाम के अधीन रखा गया। इसलिए TMC मामले में भी अदालत के सामने केवल ‘आदेश बरकरार रखना या रद्द करना’ ही एकमात्र संभावित प्रक्रियात्मक रास्ता नहीं है; चुनावी प्रक्रिया को देखते हुए अंतरिम सुरक्षा या वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार हो सकता है।