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मिलिए महाराष्ट्र के 55 साल के इन टीचर से, 13 साल से एक बच्चे को पढ़ाने के लिए रोज 5 किलोमीटर पैदल करते हैं सफर
महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में जिला परिषद के एक स्कूल तक पहुंचने के लिए 55 साल के टीचर जीवन मिठारी पिछले 13 सालों से हर दिन लगभग 5 किलोमीटर पैदल चलते हैं। यह रास्ता ऐसे इलाके से गुजरता है जहां गौर (जंगली भैंसे) और तेंदुए अक्सर देखे जाते हैं। सिंधुदुर्ग बॉर्डर के पास गगनबावड़ा तालुका के एक छोटे से गांव, कवलटेक धनगरवाड़ा में स्थित इस स्कूल तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। यहां बिजली भी नहीं है। साथ ही अभी यहां आधिकारिक तौर पर सिर्फ एक ही स्टूडेंट का नाम दर्ज है।मुश्किल रास्ते और गांव की घटती आबादी के बावजूद मिथारी स्कूल जाते रहे हैं। उन्होंने PTI को बताया कि भले ही बच्चे कम हों, लेकिन वे पढ़ाना जारी रखना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। मिथारी को रोजाना जंगल वाले इलाके से गुजरना पड़ता है, जहां अक्सर गौर और तेंदुए दिखाई देते हैं। ग्रामीणों ने उन्हें सिखाया है कि अकेले जानवर या जानवरों के झुंड से आमना-सामना होने पर अलग-अलग तरह से कैसे निपटना है। ये जोखिम उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गए हैं, हालांकि वे मानते हैं कि यह सफर अब भी डरावना हो सकता है।मिथारी ने PTI से कहा, 'आखिरकार हम उनके इलाके में जा रहे हैं।' उन्होंने आगे कहा, 'मैं भी एक इंसान हूं। मुझे भी डर लगता है। लेकिन समय के साथ यह आदत बन गई है।'महाराष्ट्र के शिक्षक उस दूर-दराज के स्कूल में क्यों काम करते रहते हैं?कवलटेक धनगरवाड़ा में मिथारी की पोस्टिंग कोई ऐसी चीज नहीं थी, जिसे उन्हें मजबूरी में स्वीकार करना पड़ा हो। उन्होंने 2013 में खुद ही ट्रांसफर की मांग की थी। उस दूर-दराज के स्कूल में जाने से पहले उन्होंने कोल्हापुर जिला प्राथमिक शिक्षक सहकारी बैंक के चेयरमैन के तौर पर काम किया था। यह एक ऐसा पद था, जिससे उन्हें ज्यादा सुविधाजनक पोस्टिंग के विकल्प मिल सकते थे।PTI के अनुसार मिथारी ने बताया कि उनके कुछ साथी शिक्षकों ने कहा था कि प्रभावशाली शिक्षक आम तौर पर बेहतर कनेक्टिविटी वाले स्कूलों में पोस्टिंग हासिल कर लेते हैं, जबकि दूसरों को मुश्किल जगहों पर काम करना पड़ता है। इस पर उन्होंने जवाब दिया कि वह खुद उस दूर-दराज के स्कूल में जाएंगे।उन्हें इस रास्ते से आते-जाते हुए अब एक दशक से ज्यादा समय हो चुका है। इस रास्ते में कई खतरे भी हैं। एक घटना में, बस्ती के पास एक तेंदुए ने एक युवा बैल को मार डाला था। बाद में वन अधिकारियों ने एक कैमरा ट्रैप लगाया और कुछ समय के दौरान उस जानवर की सैकड़ों तस्वीरें कैद कीं। मिथारी को सलाह दी गई थी कि स्कूल आते-जाते समय रास्ते में कहीं रुकें या बैठें नहीं।स्कूल में अभी भी सिर्फ एक छात्र क्यों है?कवलटेक धनगरवाड़ा और पास के आनंदुर धनगरवाड़ा में कभी 70 से 100 परिवार रहते थे। 2000 के बाद आबादी कम हो गई क्योंकि लोग बेहतर और स्थिर रोजगार की तलाश में कोल्हापुर शहर चले गए। जैसे-जैसे परिवार वहां से चले गए, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या भी कम हो गई।इस साल स्कूल में आधिकारिक तौर पर सिर्फ एक बच्चा है - क्लास 3 की छात्रा स्वारा बोडाके। उसकी छोटी बहन भी अनौपचारिक रूप से स्कूल आती है, क्योंकि उस बस्ती में कोई आंगनवाड़ी (छोटे बच्चों के लिए सरकारी देखभाल केंद्र) नहीं है। उम्मीद है कि वह अगले साल क्लास 1 में दाखिला लेगी, जिससे स्कूल में आधिकारिक छात्रों की संख्या दो हो जाएगी।वहां रहने वाले परिवारों के लिए स्कूल को चालू रखना जरूरी है, क्योंकि सबसे पास का दूसरा स्कूल इतनी दूर है कि छोटे बच्चों के लिए वहां आसानी से आना-जाना मुश्किल है। धुंडावाड़े का स्कूल लगभग 5.5 किलोमीटर दूर है, जिसका मतलब है कि छात्रों को क्लास में जाने और घर लौटने के लिए हर दिन लगभग 11 किलोमीटर का सफर करना होगा। महाराष्ट्र के मॉनसून के मौसम में यह दूरी और भी बड़ी चुनौती बन जाती है।बस्ती के लोग ज्यादातर छोटे पैमाने की खेती, जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने और जामुन व करवंद जैसे जंगल के उत्पाद जमा करने पर निर्भर हैं। किसान अपनी फसलों को गौर (जंगली भैंसों) से बचाने के लिए खेतों के चारों ओर दोहरी बाड़ लगाते हैं, क्योंकि ये जानवर अक्सर इलाके में आ जाते हैं।रिटायरमेंट से पहले टीचर सुरक्षा इंतजाम चाहते हैंमिठारी मई 2029 में रिटायर होने वाले हैं। अगर वह रिटायरमेंट तक वहीं रहते हैं, तो उन्हें उस दूर-दराज के स्कूल में लगभग 16 साल हो जाएंगे। वह चाहते हैं कि स्कूल के चारों ओर एक बाउंड्री वॉल (चारदीवारी) बनाई जाए ताकि क्लास में आने वाले बच्चों की सुरक्षा बेहतर हो सके, खासकर इसलिए क्योंकि जंगली जानवर बस्ती के पास आ जाते हैं।रोजाना पांच किलोमीटर पैदल चलना मिठारी के लिए शारीरिक कसरत का भी एक जरिया बन गया है। लेकिन यह रूटीन उस छोटी बस्ती के सामने आने वाली बड़ी चुनौतियों को भी दिखाता है, जहां पलायन की वजह से आबादी कम हो गई है, जबकि आस-पास का जंगल रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालता रहता है।
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Moneycontrol हिंदी
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