हूती के लड़ाकों को कोई पहली बार देखेगा, तो एक गरीब मजदूर समझेगा. दुबला-पतला शरीर, पैरों में हवाई चप्पल, लुंगी जैसा एक कपड़ा लपेटे, बदन पर पतली सी फटी-पुरानी शर्ट...लेकिन ये लड़ाके जब हाथ में बंदूक और कंधे पर रॉकेट लांचर लेकर लड़ने पर उतारू होते हैं, तो अमेरिका जैसी महाशक्ति के माथे पर भी पसीना छलक उठता है. अरब में इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है.हूती के हमलों से सऊदी अरब छलनी हो रहा है, जो देश कल तक पूरी दुनिया में तेल का सुल्तान था, आज उसका एक भी जहाज लाल सागर को पार नहीं कर पा रहा, क्योंकि होर्मुज का रास्ता ईरान ने बंद कर रखा है, बाब अल मंदेब पर हूती का पहरा है, और ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन भी ठप पड़ी है.हूती सऊदी अरब को हर तरफ से घेरकर, उनपर आसमान से मिसाइलें बरसा रहे हैं. लाचार सऊदी अरब अपने दोस्त अमेरिका की ओर आस लगाए देख रहा है, लेकिन अमेरिका खामोश है. अमेरिका खामोश क्यों है, वो खामोश है या उसे खामोश कर दिया गया है.मक्का पर अटैक से सऊदी की बढ़ी टेंशनशाम का वक्त था, इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का में रोज की तरह शांति थी. मस्जिदों से अजान की आवाज गूंज रही थी. अजान खत्म होते ही...मक्का का आसमान हवाई हमले की चेतवानी देने वाले सायरन से गूंज उठा. इस आवाज ने मक्का की गलियों में खौफ की लहरें पैदा कर दीं...लोगों में अफरा तफरी मच गई.सायरन और भय का कारण था, यमन की तरफ से दागे गए हूतियों के ड्रोन. बताया जा रहा है कि, वो लड़ाकू ड्रोन तेजी से मक्का की तरफ बढ़ रहे थे, लेकिन सऊदी अरब के एयर डिफेंस सिस्टम ने उन्हें मक्का शहर के सीमा पर ही मार गिराया.बताया जा रहा है कि केवल मक्का ही नहीं, हूती के निशाने पर जेद्दा और ताइफ जैसे बड़े शहर भी थे, लेकिन सऊदी अरब को ऐसे हमलों की पहले से आशंका थी, लिहाजा एयर डिफेंस सिस्टम को एक्टिव कर दिया गया था, लेकिन इतिहास में पहली बार मक्का शहर आज रेड अलर्ट की साए में सांस ले रहा है, लेकिन हूती ने मक्का पर हमले को सऊदी अरब की मनगढ़ंत कहानी बताया है.8 सितंबर से हूती का सऊदी पर लगातार हमला8 सितंबर से हूती लगातार सऊदी अरब पर हमले किए जा रहा है, साथ ही यमन में भी अपने जमीनी नियंत्रण का दायरा बढ़ा रहा है, नतीजा ये हुआ की सऊदी अरब फिलहाल हर तरफ से घिर चुका है.सऊदी के लिए होर्मुज के रास्ते ईरान ने पहले ही बंद कर रखे थे. अब बाब आल मंदेब पर हूती के कब्जे के बाद दूसरा रास्ता भी बंद हो चुका है. ईस्ट-वेस्ट पाइप लाइन टूटी पड़ी है. हूतियों के खौफ का आलम ये है कि स्वेज के रास्ते सऊदी अरब की मदद करने के लिए मिस्र को भी सोचना पड़ रहा है, क्योंकि हूतियोें के डर से तेल के जहाजों का अब स्वेज के रास्ते आना बहुत कम हो चुका है.अब सवाल ये खड़ा होता है कि, अरब में आग लगाने वाला अमेरिका अब चुप क्यों है? जबकि सऊदी अरब की ईरान से दुश्मनी की सबसे बड़ी वजह, अमेरिका से उसकी दोस्ती है, जो 80 साल से भी पुरानी है...80 साल पुरानी दोस्ती, अमेरिका ने फिर क्यों साधी चुप्पी?इसके पीछे की कहानी है. 14 फरवरी, 1945, ग्रेट बिटर लेक, स्वेज नहर, मिस्र में अमेरिका का पोत यूएसएस क्विंसी लंगर डाले खड़ा था. जहाज के अंदर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट और सऊदी अरब के संस्थापक सुल्तान अब्दुल अजीज के बीच एक अहम बैठक चल रही थी. दरअसल यही बैठक अमेरिका और सऊदी अरब की गहरी दोस्ती की नींव थी.दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका तेल की शक्ति समझ चुका था, लेकिन उसके घरेलू तेल भंडारों पर दबाव था, इसके लिए उसे एक ऐसा तेल स्रोत चाहिए था, जो लंबे समय तक उसके साथ बना रहे. वहीं सऊदी अरब की आर्थिक हालत उस समय खराब थी, साथ ही कुछ क्षेत्रीय ताकतें सऊदी अरब पर निगाह लगाकर बैठीं थीं. ऐसे में सऊदी किंग को शक्तिशाली महाशक्ति की सुरक्षा छतरी चाहिए थी.दोनों देशों के एक दूसरे की जरूरत को समझा और उसी वक्त झील में तैर रहे जहाज में एक गहरी दोस्ती का लंगर डाला गया. अमेरिका ने पैसे और रक्षा का भरोसा दिया, बदले में सऊदी अरब ने तेल देते रहने की कसम खाई, लेकिन आज सऊदी अरब अभी तक के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है, तेल का व्यापार करीब-करीब ठप है...लेकिन अमेरिका अपने दोस्त की रक्षा करने से कतरा रहा है.सऊदी ने अमेरिका से लगाई सुरक्षा की गुहारसोमवार का दिन था, शाम करीब साढ़े पांच बचे सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर से मुलाकात करके सुरक्षा की गुहार लगाई, लेकिन ब्रैड कूपर ने साफ इंकार कर दिया. कहा गया कि अब यूएस किसी भी हाल में ईरान या उसके किसी समर्थित गुट के साथ किसी नए संघर्ष में नहीं उलझेगा.सऊदी अरब परेशान था, अपनी क्षमता के हिसाब से वो हूतियों को जवाब भी देता रहा, लेकिन ईरान से मिली तकनीक और हूतियों के विनाशक हथियारों के सामने वो कहीं टिक नहीं पा रहा. जेद्दा की बैठक में मना करने के बावजूद सऊदी के क्राउन प्रिंस को उम्मीद थी कि उनका दोस्त आज नहीं तो कल जरूर याद करेगा, लेकिन 14 सितंबर की बैठक के ठीक 2 दिन बाद, रही-सही उम्मीद भी खत्म हो गई.कुछ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, हूती का एक प्रतिनिधि दल अमेरिकी अधिकारियों से मिला था, जिसमें हूती की तरफ से ये आश्वासन दिया गया कि उनके निशाने पर अमेरिकी नौसेना या कमर्शियल जहाज नहीं हैं, उनका सैन्य अभियान केवल सऊदी अरब तक सीमित है.हूतियों से अमेरिका को क्यों है खौफ?इस आश्वासन के बाद, वाशिंगटन ने फैसला लिया कि, वो हूती ठिकानों पर नए सिरे से प्रत्यक्ष बमबारी नहीं करेगा, और न ही सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए कोई नया सैन्य मोर्चा खोलेगा. इसके अलावा एक और खौफ है, जो अमेरिका को हूतियों पर हमले से रोक रहा है...और ये वजह सबसे बड़ी मानी जा रही हैदरअसल अमेरिका को हूतियों के इस्लामिक विरासत का खौफ है. हूती, जैदी शिया समुदाय से आते हैं, जो पैगंबर मुहम्मद के नवासे के वंशज माने जाते हैं..पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा की शादी अली इब्न अबी तालिब से हुई थी..इन दोनों से दो बेटे हुए, जिनका नाम है, हसन और हुसैन. यानी हसन और हुसैन, पैगंबर मुहम्मद के नवासे हुए.हूती खुद को इन्हीं का वंशज मानते हैं.अमेरिका जानता है कि अगर उसने हूतियों पर हमला किया, तो हूती की यही विरासत, दुनियाभर के शियाओं को एकजुट कर सकती है. यही समर्थन ट्रंप की मुश्किलें बढ़ा सकती है। इससे निपटना किसी भी देश के लिए आसान नहीं होगा.हूती के चीफ अब्दुल मलिक अल-हूती का साफ संदेश है कि अगर तुम सेना पर हमला करोगे तो हम रियाद पर अटैक करेंगे. अगर तुम हमारे पोर्ट को टारगेट करोगे तो हम तुम्हारे पोर्ट को तबाह करेंगे. अगर तुम हमारी घेराबंदी करोगे तो हम तुमको चारों तरफ से घेरेंगे. वाशिंगटन का संदेश साफ है, अरब में उसकी प्राथमिकता अमेरिकी संपत्तियों और सैनिकों को बचाना है, न कि सऊदी अरब के क्षेत्रीय युद्धों में ढाल बनकर खड़े होना, वैसे भी जो खुद परेशानियों से घिरा हो, वो किसी और की क्या मदद करेगा?ब्यूरो रिपोर्ट, टीवी9 भारतवर्षये भी पढ़ें- मक्का अटैक से सऊदी में टेंशनहूती के ड्रोन-मिसाइल रोकने के लिए 4 देशों से मांगी मदद