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एक पुण्य, कहीं पाप न बन जाए! बंदरों को खाना खिलाना सही या गलत, क्या कहता है जंगल का कानून?
Monkey Feeding: उत्तराखंड के रामनगर और कॉर्बेट क्षेत्र में सड़क किनारे बंदरों को खाना खिलाना आम बात है. कई लोग इसे पुण्य का काम मानकर बंदरों को फल, बिस्किट, चिप्स और दूसरी खाद्य सामग्री देते हैं. देखने में यह भले ही सेवा भाव से जुड़ा लगे, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक इंसानों की यही आदत बंदरों के प्राकृतिक व्यवहार में बदलाव ला रही है. जंगल में पेड़-पौधों से प्राकृतिक भोजन तलाशने के बजाय बंदर अब सड़क किनारे आसानी से मिलने वाले खाने की ओर आकर्षित हो रहे हैं.कॉर्बेट और आसपास के इलाकों में कई सड़कों पर बंदरों के झुंड दिखाई देते हैं. कुछ जगह लोग वाहन रोककर उन्हें खाना खिलाते हैं. प्रसिद्ध वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर और वन्यजीव विशेषज्ञ दीप रजवार के मुताबिक लंबे समय से चल रही इस आदत का असर बंदरों के व्यवहार पर पड़ रहा है. उनका कहना है कि जब बंदरों को जंगल में भोजन तलाशने के बजाय सड़क किनारे आसानी से खाना मिलने लगता है, तो वे इंसानी आबादी और सड़कों की ओर आने लगते हैं. इससे उनका प्राकृतिक व्यवहार कमजोर होता है और इंसानों तथा वन्यजीवों के बीच दूरी भी कम होती जाती है.सड़क पर बढ़ी मौजूदगी तो हादसे का खतरा भी बढ़ादीप रजवार के मुताबिक बंदरों का सड़क किनारे अधिक समय बिताना उनके लिए खतरनाक साबित हो सकता है. सड़क पर वाहनों की आवाजाही के बीच उनके रोड एक्सीडेंट का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा इंसानों के करीब आने के कारण बंदरों के व्यवहार में आक्रामकता भी देखने को मिल सकती है.[caption id="attachment_3910822" align="alignnone" width="1600"] (फोटो-pti)[/caption]कई बार बंदर लोगों से खाना छीनने के लिए झपटते हैं या बैग लेकर भाग जाते हैं. ऐसे मामलों में इंसान और वन्यजीव दोनों के लिए खतरा पैदा हो सकता है.चिप्स और प्रोसेस्ड फूड से स्वास्थ्य पर असरकॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला भी बंदरों के बदलते व्यवहार के पीछे मानवीय गतिविधियों को एक अहम कारण मानते हैं. उनके मुताबिक जंगलों और घरों के आसपास कूड़ा फेंकने तथा बंदरों को कृत्रिम रूप से खाना खिलाने से वे इंसानी इलाकों की ओर आकर्षित हो रहे हैं.उनका कहना है कि चिप्स और अन्य प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ बंदरों के प्राकृतिक भोजन का हिस्सा नहीं हैं. ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. उनके मुताबिक त्वचा और श्वसन संबंधी समस्याओं जैसी बीमारियां भी सामने आने की बात कही गई है.[caption id="attachment_3910821" align="alignnone" width="1600"] (फोटो-pti)[/caption]क्लीन कॉर्बेट, ग्रीन कॉर्बेट पर जोरवन विभाग लोगों से लगातार अपील कर रहा है कि जंगली जानवरों को कृत्रिम रूप से खाना न खिलाएं और जंगल के आसपास कूड़ा-कचरा न फैलाएं. कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की ओर से क्लीन कॉर्बेट, ग्रीन कॉर्बेट अभियान भी चलाया जा रहा है. इसमें होटल व्यवसायियों, नेचुरलिस्टों, जिप्सी चालकों और अन्य हितधारकों को जोड़ा जा रहा है.वन्यजीवों की मदद का सबसे बेहतर तरीका उन्हें इंसानों पर निर्भर बनाना नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास और व्यवहार को सुरक्षित रखना है. सड़क किनारे बंदरों को खाना खिलाने की छोटी-सी आदत भले ही लोगों को खुशी दे, लेकिन इसका असर उन्हें जंगल से सड़क और फिर मानव-वन्यजीव संघर्ष की ओर धकेलने के रूप में सामने आ सकता है.
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TV9 हिंदी
· नमित अग्रवाल